Wednesday, 21st November, 2018

आठवें दिन ही लौटे गणपति: दर्ज कराई शिकायत

27, Sep 2015 By श्रीकांत चौहान

आधुनिकता की इस दौड़ में गणपति सिर्फ इसलिए पीछे रह गए क्यूंकि उनके पास ना आयरन मेन जैसा सूट हैं ना ही ड्रेगन वाली सवारी। पहले ही दिन जब गणपति पधारे हमने सिनामेघरो में MSG-2 फिल्म लगा कर साथ ही हनी सिंह व चिट्टियाँ कलइयां गाने बजा उनकी सहनशक्ति की तगड़ी परीक्षा भी ले ली।

चेहरा देखो ज़रा इस हीरो का.. मेरे दर्शन करने भी आया है जिसका कारण है सेल्फि फीवर। मन तो कर रहा है युं हाथ लंबा कर के धक्का ही दे दूँ।
“चल बेटा दर्शन भी कर ले रे.. चेहरा देखो ज़रा इस हीरो का। मन तो कर रहा है युं हाथ लंबा कर के धक्का ही दे दूँ। बेटा तुम्हे सेल्फी से ज़्यादा मेरे आशीर्वाद की ज़रूरत है”: गणेश जी सोचते हुए

पहले ही दिन से गणपति अनकम्फ़र्टेबल महसूस कर रहे थे, लड़कियों का ‘awwww! cho sweet’ कहकर उनके कान खींचना, युवाओं का उनके साथ तरह तरह के पोज देकर सेल्फी लेना, उनके लिए बकासुर से युद्ध लड़ने से भी ज्यादा कठिन क्षण था। गणपति के पंडालो में श्लोक व मंत्र ढूँढना किसी चींटी की लाश में किडनी ढूँढने जितना मुश्किल था। इसके अलावे गणपति तरह तरह की डिमांड सुनकर भी खीझ खा चुके थे। मसलन कैंडी क्रश रुकवाइये, सूर्यवंशम बंद कराइए, लौकी की सब्जी पर रोक,गोल्ड फ्लेक में रूहाफजा फ्लेवर और तो और एक बंदे ने अपनी पोस्ट पर ज्यादा लाइक्स तक मांग लिए। पड़ोस वाली रीमा आंटी का उनके कानो में अपनी बहू की चुगली करना, दिन भर दर्शन करने आई महिलाओं से ये सुनना कि किसका चक्कर किसके साथ चल रहा व पंडाल में बैठे लडको का ये कहकर थाली से पैसे ले लेना कि अगली बार लौटा देंगे, से उनके धैर्य का बाँध किसी चाइनीज प्रोडक्ट की तरह अंतिम साँसे गिनने लगा।

ये धैर्य का बाँध अंतिम चरण पर तब पहुँच गया जब बिहार में एक भक्त उनके सामने ताली बजाने लगा, गणपति भी खुश हुए लेकिन उन्हें झटका तो तब लगा जब ये पता चला कि वो ताली बजाने की बजाए खैनी पीट रहा था। हद तो तब हो गयी जब किसी ने पूछ लिया कि भगवान् आप ही बताओ कि आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? और धैर्य तब टूट गया जब एक नेता पंडाल में आकर उनके हाथ में मोबाइल पकड़ाकर एक मिस कॉल करते हैं और कहते हैं बधाई हो.. आज से बप्पा भी हमारी पार्टी के मेम्बर बन गए।

ये सब देख गणपति रातोरात पंडाल से ऐसे गायब हो गए जैसे आधुनिक युग में लज्जा गायब हो गयी है। रास्ते भर सोचते रहे कि उन्हें भगवान की क्या जरुरत जो किसी भी ऐरे गैरे बाबा, ढोंगी, पाखंडी व नेता को अपना भगवान मान लेते है। गणपति कैलाश उतरने से पहले कान के डॉ. के पास गए, इलाज़ कराया फिर अपने माता-पिता के पास जाकर सारी कहानी सुनाई व शिकायत दर्ज कराई। वो तो अगले साल नहीं आने का सोच रखे थे लेकिन आयेंगे उस सवाल का जवाब खोजने जो एक भक्त ने पूछा था कि प्रभु! आपकी दो दो पत्नियां हैं फिर भी आप “बुद्धि” के देवता कैसे बन गए?