Friday, 17th August, 2018

राज्यसभा में आयोजित हों साप्ताहिक कवि सम्मलेन- कुमार विश्वास

14, Mar 2018 By Kumar Dharmendra

राज्यसभा की सदस्यता का बखेड़ा अभी ख़तम भी नहीं हुआ था की कुमार विश्वास जी ने फिर से भानुमती का पिटारा खोल दिया है। उनकी क्रन्तिकारी कविताओं और मॉडेस्ट मीन्स ने सालों से आम जनता को लुभाये, भरमाये रखा है. यहाँ तक की दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन भाजपा भी महीनों से दोराहे पर खड़ा है की कुमार जी पर विश्वास करें या न करे. टू बी और नॉट टू बी को सुलझाते सुलझाते अमित भाई शाह ने कई राज्यों में विरोधियों की मिटटी पलीद कर दी लेकिन कुमार विश्वास वाली पहेली अब भी पहेली ही है. अरविंद केजरीवाल गफलत में थे की ‘बला टल जाएगी’ लेकिन ऊँट है की किसी करवट बैठ ही नहीं रहा.

kavi vishwas
कविता सुनाकर खुश होते कुमार विशवास

पिछले चुनाव में अमेठी वालों ने जिस तरह अंगूठा दिखाया था अरविंद जी समझ गए थे कविताओं से उत्तर प्रदेश की जनता को रिझाना आसान नहीं है. वहाँ के लोग अभी भी रोटी, कपडा और खानदान को प्राथमिकता देते हैं. कविताओं के कारोबार को अब भी निठल्ले लोगो से जोड़ दिया जाता है. जिसकी पेट भरी हो वही तो कविता गाएगा भला. जब उन्होंने कृष्ण को ‘भूखे भजन न होहिं गोपाला …’ कह डाला था तो बेचारे कुमार जी ने क्या खाया था की उनकी बात चलती।

कुमार जी इससे तवज्जो नहीं रखते, उन्हें लगता है कवितायेँ दुनिया बदलने का, वैचारिक क्रांति का एक सशक्त माध्यम है और लोगों को इसे समझना चाहिए। ‘जब मेरी बातों को दुबई और ओमान वाले समझ सकते हैं तो यहाँ के लोग क्यों नहीं। उनको मेरी कवितायेँ इतनी पसंद हैं की मेरी दो साल की सारी डेट्स बुक्ड हैं.’ सवाल पूछे जाने पर की राजनीति वे भला कैसे कर पाएंगे? इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ‘मुझे इसके लिए जब भी टाइम मिलता है मैं कूद पड़ता हूँ. अगर सही में लोगों की मंशा मुझे इंडिया में रखने की है तो मुझे यहाँ के कवी सम्मेलनों के लिए बुक करने का आवाह्न मैं आयोजकों से करता हूँ.’ यह पूछे जाने पर की उनकी डिमांड बहुत ज़्यादा है, को काटते हुए उन्होंने सफाई दी, ‘अब दाल और बिरियानी का रेट एक कैसे हो सकता है भला. भारत में इतने सारे नए एयरपोर्ट्स हो गए हैं कहीं भी जाना मुश्किल थोड़े ही है.’

अपनीबात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को सलाह दी, ‘जैसे दरबारों में कवियों को रत्न माना जाता था वही सम्मान आज भी हमें मिले तो सबका भला होगा। साप्ताहिक कवी सम्मेलनों का आयोजन विधानसभाओं से लेकर दोनों संसद सदनों में होना चाहिए। संसद का स्थगन भी हो जाए तब भी खा पी कर सांसद इकट्ठे बैठकर कविताओं का आनंद लें ऐसी मेरी कामना है. राज्य सभा में यह तुरंत शुरू हो तो ज़्यादा अच्छा रहेगा।’